Wednesday, March 05, 2014

झीनी झीनी बीनी चदरिया, पानी बीच मीन पियासी

झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥
काहे कै ताना काहे कै भरनी, 
कौन तार से बीनी चदरिया ॥ १॥
इडा पिङ्गला ताना भरनी, 
सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ २॥
आठ कँवल दल चरखा डोलै,
पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ ३॥
साँ को सियत मास दस लागे, 
ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ ४॥
सो चादर सुर नर मुनि ओढी,
ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥ ५॥
दास कबीर जतन करि ओढी, 
ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥ ६॥

पानी बिच मीन पियासी 

पानी बिच मीन पियासी।
मोहि सुनि सुनि आवत हाँसी ।।
आतम ग्यान बिना सब सूना, क्या मथुरा क्या कासी ।
घर में वसत धरीं नहिं सूझै, बाहर खोजन जासी ।।
मृग की नाभि माँहि कस्तूरी, बन-बन फिरत उदासी ।
कहत कबीर, सुनौ भाई साधो, सहज मिले अविनासी ।।

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